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Wednesday, 13 February 2019

काश

काश! यादों के उस तट से गुजरे न होते हम....

रंग घोलती उन फिजाओं में,
शिकवे हजार लिए अपनी अदाओं में,
हाँ, पहली बार यूँ मिले थे तुम.....

कशिश बला की उन बातों में,
भरी थी शरारत उन शरमाई सी आँखों में,
हाँ, वादे हजार कर गए थे तुम.....

नदी का वो सूना सा किनारा,
वो राह जिनपर हम संग फिरे थे आवारा,
हाँ, उन्हें तन्हा यूँ कर गए थे तुम.....

ढली सुरमई सांझ कभी रंगों में,
कभी रातें शबनमीं तुझको पुकारती रहीं,
हाँ, मुद्दतों अनसुनी कर गए थे तुम....

बातें वो अब बन चुकी हैं यादें,
रह रह पुकारती है मुझको, तेरी वो बातें,
हाँ, लहरों सी यादें देकर गए थे तुम......

काश! यादों के उस तट से गुजरे न होते हम....

Saturday, 26 January 2019

निःस्वार्थ

निःस्वार्थ ! स्नेह कहीं मिल जाए, तो कोई बात बने!

वो कहते हैं, कुछ अपने दिल की कह लूँ,
तन्हाई बुन लूँ, धुन चुन लूँ, फिर दिन-रात ढ़ले!
साथ कोई जग में, यूँ ही कब देता है?
यूँ बिन मतलब के, बात यहाँ कब करता है?
स्वार्थ सधे, तो बातों का झरना है!
सबकी अपनी धुन, अपनी ही राह है,
मतलब की यारी, बेमतलब क्या होना है?

निःस्वार्थ! कोई दिल की सुने, तो कोई बात बने।

वो कहते है, दो-चार कदम साथ चलूँ,
चंद साँसें, साँसों मे भरूँ, तो ये जीवन ढ़ले!
क्या कदमों का चलना ही जीवन है?
दो चार कदम, संग ढ़लना ही क्या जीवन है?
जीवन क्या, बस स्वार्थ ही सधना है?
सबकी अपनी चाल, अपना ही रोना है,
ये है इक आग, जिसमें जलकर खोना है।!

निःस्वार्थ! कोई संग गुनगुनाए, तो कोई बात बने।

निःस्वार्थ! यूँ हीं प्यार मिल जाए, तो कोई बात बने!

Monday, 21 January 2019

नीड़-इक कल्पना

आँचल तले इक नीड़,
बना लेता ये खग, किसी कल्पना से भी सुन्दर!

हो कौन? अंजाना हूँ अब तक तुमसे,
लिपटा है मन, धुंध मे बस उस आँचल से,
लहराता हूूँ मैं, नभ में संग आँचल के,
छाँव वही प्यारा सा, गहराया अब इस मन पे।

प्रीत की डोर, बँँधी आँचल की कोर,
मन-विह्ववल, चित-चंचल, चितवन-चितचोर,
आँचल लहराता, जिया उठता हिलकोर,
उस ओर चला मन, आँचल उड़ता जिस ओर।

रंग-बिरंगे, सतरंगे, आँचल के कोर,
अति मन-भावन, उस आँचल के डोर-डोर,
छाँव घनेरी उन पर, जुल्फों के हर ओर,
बांध गया मन, आँचल से करता गठ-जोड़।

खग सा ये मन, नभ सा वो आँचल,
नभ पर मंडराता हो, जैसे कोई हंस युगल,
बूूँदें रिमझिम लाई, कल्पना के बाादल,
काश! मेेेेरा हो जाता, सुनहरा वो आँचल!

आँचल तले इक नीड़,
बना लेता ये खग, किसी कल्पना से भी सुन्दर!